webduniyahindi | भगवान शिव ने श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का वध क्यों किया था ?
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भगवान शिव ने श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का वध क्यों किया था ?

भगवान शिव ने श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का वध क्यों किया था ?

भगवान शिव ने श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का वध क्यों किया था ?

 

भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता के बारे में शास्त्रों में मित्रता की एक मिसाल दी जाती है। भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता ने एक अलग छवि बनाई थी जिसे आज भी दुनिया मित्रता के रूप में याद करती है

भगवान शिव ने श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का वध क्यों किया था ?

भगवान शिव ने श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का वध क्यों किया था ?

लेकिन श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का एक रूप वह भी था जिसका स्वयं भगवान् शिव ने वध किया था। माना इस तथ्य पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन हिन्दू धर्म के पुराणों की कथा के अनुसार ये सत्य सामने आया।

आखिर क्यों भगवान् शिव ने सुदामा का वध किया ,आइये जानते हैं इस कथा के माध्यम से। …….

स्वर्ग के विशेष भाग गोलोक में सुदामा और विराजा नाम की एक कन्या निवास करती थी। विराजा को भगवन श्री कृष्ण से प्रेम था जबकि सुदामा को विराजा से प्रेम था।

एक बार विराजा भगवान् श्री कृष्ण के आकर्षण में उनके पास चली गयी। विराजा और श्री कृष्ण को जब  साथ देखा तो क्रोध में विराजा को राधा ने श्राप दे दिया कि वह गोलोक से पृथ्वीलोक पर निवास करेगी। किसी कारण वश सुदामा को भी एक श्राप के कारण पृथ्वीलोक पर जन्म लेना पड़ा।

मृत्युलोक में सुदामा का जन्म राक्षस राज दम्भ के यहां शंखचूर्ण के रूप में हुआ तथा विरजा का जन्म धर्मध्वज के यहां तुलसी के रूप में हुआ।

माँ तुलसी से विवाह के पश्चात शंखचूर्ण उनके साथ अपनी राजधानी वापस लौट आये। कहा जाता है कि शंखचूर्ण को भगवन ब्रह्मा का वरदान प्राप्त था। और उन्होंने शंखचूर्ण की रक्षा के लिए एक कवच भी दिया था। और साथ ही यह भी कहा था कि जब तक तुलसी तुम पर विश्वास करेगी तब तक तुम्हे कोई जीत नहीं पायेगा।

और इसी कारण शंखचूर्ण कई युद्ध जीतते हुए तीनो लोक के स्वामी बन गए।

शंखचूर्ण के क्रूर अत्याचार से  परेशान होकर देवताओं ने ब्रह्मा से सुझाव की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी द्वारा भगवान विष्णु से सलाह लेने की बात कहे जाने पर सभी देवता विष्णु के पास गए। तब विष्णु ने उन्हें शिवजी से सलाह लेने को कहा।

देवताओं की परेशानी को समझते हुए भगवान शिव ने उन्हें शंखचूर्ण को मारकर उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाने का वचन दिया। लेकिन इससे पहले भगवन शिव ने शंखचूर्ण को शांतिपूर्वक देवताओं को उनका राज्य वापस उन्हें सौंपने का प्रस्ताव रखा। परन्तु हिंसावादी शंखचूर्ण ने शिव को ही युद्ध लड़ने के लिए बाध्य कर दिया।

शंखचूर्ण यानी की सुदामा के पुनर्जन्म के रूप में युद्ध के प्रस्ताव के पश्चात भगवान् शिव ने अपने पुत्रों कार्तिकेय और गणेश को युद्ध के लिए भेजा।

शंखचूर्ण पर ब्रह्मा के वरदान के कारण उसे मारना मुश्किल था। अंत में भगवान् विष्णु युद्ध के दौरान शंखचूर्ण के सामने प्रकट हुए। और उनसे उनका कवच माँगा। शंखचूर्ण ने तुरंत ही कवच भगवान् विष्णु को सौंप दिया।

तत्प्श्चात माँ पार्वती के कहने पर भगवान् विष्णु ने कुछ ऐसा किया कि युद्ध का पूरा दृश्य ही बदल गया। वे शंखचूर्ण के कवच को पहनकर तुलसी के सामने प्रकट हुए।

उनके उस रूप को देखकर तुलसी उन्हें अपना पीटीआई मान बैठी ,और बहुत प्रसन्नता से उनका आदर सत्कार किया। जिस कारण तुलसी का पतिव्रत्य खंडित हो गया। शंखचूर्ण की शक्ति उनके पतिव्रत्य पर स्थित थी। इस घटना के बाद उसकी शक्ति निष्प्र्भाव हो गयी।

वरदान की शक्ति के समापन होने के बाद भगवान् शिव ने शंखचूर्ण का वध करके देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्त किया। इस प्रकार सुदामा अपने पूर्व जन्म में महादेव के द्वारा मृत्यु को प्राप्त हुए।

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