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संकट में है भारत !

संकट में है भारत !

भारत ने आजादी के बाद से ही अपनी विदेश निति को प्राथमिकता पर रखा है विशेषकर पडोसी देशो के साथ. हिंदुस्तान को दुनिया में धर्मनिरपेक्षता और गुट निरपेक्षता के लिए सम्मान की नजरों से देखा जाता रहा हैं। उसके बावजूद पिछले कुछ सालों में ये महसूस हो रहा है कि चीन जो कि भारत का सबसे चिर प्रतिद्वंदी है वो भारत के लगभग सभी पड़ोसी देशो को अपने पक्ष में लाने में कामयाब हो रहा है जो भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

आपको यहां  बताना बहुत जरूरी है कि भारत की नौ देशों से सीमा मिलती है जिनमें से श्री लंका और मालद्वीप से जल सीमा मिलती हैं जबकि बाकि सात देशों से थल सीमा मिलती हैं जिनमे पाकिस्तान ,चीन ,म्यांमार ,भूटान ,अफगानिस्तान ,बांग्लादेश और नेपाल हैं.अब आपको बतातें हैं कि कौन सा देश भारत में समर्थन में है और कौन सा चीन के समर्थन में ?

पाकिस्तान और चीन एक दूसरे  हर मौसम दोस्त मानते है और एक दूसरे को खूब सहयोग करतें हैं खासकर तब ,जब भारत के भी हित उनसे जुड़े हों। दक्षिण एशिया के देशों के समूह सार्क में भारत ने पाकिस्तान को अलग थलग करने में कामयाबी हासिल की थी.भारत ने पड़ोसी देशों के इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में सहयोग का वादा किया लेकिन जब चीन ने अपने महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड के लिए सम्मेलन किया तो भूटान के अलावा सभी देश उत्सुक दिखाई दिए।

मालदीप ने चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट करके भारत को बड़ा झटका दिया क्योकि भारत इस एग्रीमेंट के लिए एक लम्बे अरसे से इन्तजार में था। मालदीप हिन्द महासागर के बेहद अहम रुट पर है जो व्यापार के लिए भी महत्वपूर्ण है ,यहां चीन के कई प्रोजेक्ट भी चल रहे हैं। मालदीप के सरकार समर्थित अख़बार भी भारत के खिलाफ लिखते रहते हैं.मालदीप को कर्ज का तीन चौथाई हिस्सा भी चीन से ही मिलता है इस लिए मालदीप चीन के समर्थन में रहता है.

नेपाल और भारत पुराने व्यापारिक पड़ोसी रहे हैं लेकिन कुछ सालों से ये रिश्ते सामान्य नहीं चल रहे। नेपाल के नव नियुक्त प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली चीन के साथ अपना लगाव मानते हैं। चीन ने नेपाल में काफी निवेश बढ़ा दिया है और बीच की दूरियों को घटाने के लिए रेल प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है।

श्री लंका लगातार चीन के कर्ज के जाल में फसता जा रहा है ,श्री लंका को इस कर्ज के जाल से निकलने के लिए अपने हंबनटोटा पोर्ट को चीन के हाथों में सौंपना पड़ा है.श्रीलंका भी लगातार चीन की तरफ अपना झुकाव दिखा रहा है। यही नहीं चीन श्री लंका के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की जुगत लगा रहा है।

भूटान की अगर बात की जाये तो भूटान ने हमेशा नाजुक वक्त पर भारत का साथ दिया है खास कर डोकलाम विवाद पर। डोकलाम विवाद भूटान और चीन के बीच काफी दिनों से चल रहा है जिसके लिए चीन लालच भी देता रहा है। असलियत में चीन भूटान को डोकलाम के बदले में भूटान को कोई दूसरा इलाका देना चाहता है जबकि भूटान भारत की चिंताओं को देखते हुए चीन से सहमत नहीं हो रहा। अगर भूटान चीन  का ऑफर मान लेता है तो भारत को इसके गंभीर अंजाम भुगतने पड सकते हैं।

बांग्लादेश और चीन के बीच 2002 में बड़ा रक्षा समझौता हो चूका है। भारत भी काफी समय से बंगलादेश के साथ एक व्यापक दीर्घकालीन रक्षा समझौता करने का इच्छुक है लेकिन बंगलादेश इस समझौते के लिए उत्सुक नहीं दिख रहा है.चीन ने बंगलादेश को दो चीनी पनडुब्बियां देकर भी भारत की चिंताए बढ़ा दी है। वैसे भी चीन बंगला देश का सबसे बड़ा बिजनेस पार्टनर बन चूका है। रोहिंग्या शरणार्थी बंगलादेश के लिए समस्या बन गए थे ,ऐसे में भारत के इन शरणार्थियों के प्रति नरम रुख के कारण बंगलादेश भारत से नाराज है.इन सब बातों के बावजूद भी शेख हसीना सरकार को भारत समर्थक माना जाता है.

म्यांमार भी चीन के कर्ज तले बुरी तरह फसा हुआ और उसी के फेवर में दीखता है यद्यपि भारत भी म्यांमार में अच्छा खासा निवेश कर रहा और रोहिंग्या मामले में भी भारत ने म्यांमार को खुश करने की कोशिश की है।

भारत के सभी पुराने मित्र पड़ोसी देश एक एक करके चीन के पाले में जा रहे हैं जिससे भारत संकट में घिरता जा रहा है। इन बदलते समीरकणों को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। यहां तक कि भारत के एक पारम्परिक मित्र रूस जिसने हर बुरे समय में भारत का साथ दिया है, आज उसका पाकिस्तान को हथियार सप्लाई करना निश्चित रूप से चिंतित करता है।

हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री मोदी जहां अपनी विदेश यात्राओं के लिए मशहूर रहे है वही उन्हें बदनामी भी झेलनी पड़ती है। हम भारतीय जहां अपने देश में जात पात और हिन्दू मुसलमान के नाम पर देश में नफरत के बीज बोकर देश को कमजोर कर रहे हैं वहीँ चीन लगातार गुटबंदी करके भारत को घेरने में लगा है इसलिए हमें ये सीखना पड़ेगा कि हम नए मित्र बनाने से पहले पुराने मित्रों को कैसे संभाले।

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