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कौन जीतेगा गुजरात

कौन जीतेगा गुजरात

गुजरात में चुनावी बिगुल बज चूका है। तलवारें म्यान से बाहर आ चुकी हैं। सभी पार्टी अपने पुरे सामर्थ्य के साथ चुनाव मैदान में ताल ठोक रही हैं। 9 दिसम्बर और 14 दिसम्बर 2017 को दो फेज़ में चुनावों की घोषणा हो चुकी है जिसका रिजल्ट 18 दिसम्बर को आएगा। कई सर्वे एजेंसियो ने अपने सर्वे में भाजपा को आसानी से जीता हुआ घोषित कर दिया लेकिन ये सब इतना आसान नहीं लग रहा इसलिये हार जीत का फैसला करने से पहले गुजरात के राजनैतिक ,सामाजिक हालातों और जातिगत समीकरणों का विश्लेषण करना पड़ेगा।

गुजरात की कुल जनसंख्या लगभग 6 करोड़ 10 लाख है जबकि यहां 182 विधान सभा सीटें हैं। गुजरात में 88 % हिन्दू ,लगभग 10 % मुस्लिम वोटर्स हैं। बाकि सिख ,जैन और क्रिश्चन आदि की संख्या 1 % से भी कम है।

सबसे पहले ये जान लें कि गुजरात में आमतौर से दो ही पार्टियां हैं कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी। क्षेत्रीय दल भी है लेकिन वे गुजरात में कभी बहुत ज्यादा असरदार नहीं हो पाए इसलिए गुजरात में उम्मीदवारों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं होती।

भाजपा के पास जहाँ स्टार प्रचारकों और मुख्य मंत्रियों की बड़ी फौज है वही कांग्रेस के पास सिर्फ राहुल गाँधी हैं। इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस के पास नरेंद्र मोदी के मुकाबले कोई बड़ा चेहरा नहीं है जो प्रखर प्रवक्ता ,कुशल राजनैतिक,परिपक्व ,गुजरात की मिटटी से जुड़े हुए हैं और देश के प्रधान मंत्री भी हैं ,असलियत में राहुल की सक्शियत मोदी जी के सामने काफी हल्की नजर आती है।

जोश जूनून और मेहनत की अगर बात आये तो राहुल भी कम नजर नहीं आ रहे। भाजपा की राहुल के बारे में एक ही निति रही है कि सोशल मिडिया पर राहुल पर जोक्स बनाकर ,उन्हें नासमझ सिद्ध करके देश में ऐसा माहौल बनाया जाये कि लोग उन्हें गंभीरता से ही ना लें और भाजपा अपनी इस निति में कामयाब भी रही है लेकिन इस बार कांग्रेस के लिए अच्छी बात ये है कि भाजपा की ये निति फेल होती दिख रही है और राहुल की सभाओं में लगातार भीड़ बढ़ती जा रही है और राहुल भी अपनी बात कायदे से पूरी मजबूती और परिपक्वता के साथ रख रहे हैं।

मोदी जी का गुजरात से हमेशा एक दिली रिश्ता रहा है और भाजपा को इसी रिश्ते पर विश्वाश है कि भाजपा इस बार भी अपने गढ़ को बचाने में कामयाब रहेगी लेकिन मोदी जी का अब तक दर्जनों सभाओं का करना ,बार बार गुजरात जाना ,योजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास करना दर्शा रहा की भाजपा कहीं ना कही मुसीबत में है।भाजपा पर ये भी आरोप है कि उसने चुनाव आयोग पर दबाव डालकर उसे समय पर चुनाव की तिथियां डिक्लेयर करने से रोका, जिससे मोदी जी लोक  लुभावन योजनाओं की घोषणा कर सके। संघ के आंतरिक सर्वे भी भाजपा की हालत बुरी बता रहे हैं।

अगर 2014 के लोक सभा चुनावों को छोड़ दें तो पिछले कई साल में कांग्रेस ने अपनी लोकप्रियता को लगातार बढ़ाया है और अपनी हार के डिफरेंस को कम किया है। 2010 में जिला पंचायत चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ एक सीट से संतोष करना पड़ा जबकि भाजपा ने 30 जिलों में शानदार जीत हासिल की लेकिन मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 2015 में कांग्रेस को 24 सीटें मिली जबकि भाजपा 6 सीटों पर सिमट गयी।इस रिजल्ट को मोदी जी के गिरते ग्राफ की तरह देखा गया।

पाटीदार हमेशा बीजेपी के परम्परागत वोटर रहे हैं जिनकी संख्या गुजरात में 12 % है। पाटीदारों में बेरोजगारी को लेकर सरकार के खिलाफ आक्रोश है। पिछले कुछ सालों में हार्दिक पटेल पाटीदारों के एकक्षत्र नेता बनकर उभरे हैं.उनकी सभाओ में लगातार भीड़ उमड़ रही है। हार्दिक चुनाव तो नहीं लड़ रहे लेकिन पाटीदारों को आरक्षण दिलाने के लिए कांग्रेस को सपोर्ट कर रहे है अगर हार्दिक पाटीदारो की वोट कांग्रेस को दिलवा पाए तो भाजपा को एक बड़ा झटका लग सकता है।

पेशे से वकील दलित नेता जिग्नेश मेवानी भी भाजपा के लिए कांटे बोने का काम कर रहे हैं। ऊना में गौ रक्षकों द्वारा एक दलित की गाय की हत्या के शक में की गई हत्या से दलित समाज भाजपा से बुरी तरह खफा है। जिग्नेश लगातार दलितों के हितों की लड़ाई लड़ रहे है और लगातार दलितों को कांग्रेस के पक्ष में लामबंद कर रहे हैं। दलितों के कांग्रेस के पक्ष में एक जुट होने से कांग्रेस काफी अच्छी स्थिति में आ जाएगी।

अल्पेश ठाकुर भी भाजपा की जीत में बाधा बन रहे है। ये ठाकुर युवा नेता ओबीसी ,एससी ,एसटी एकता मंच और गुजरात क्षत्रिय ठाकुर सेना का अध्यक्ष है। अल्पेश ओबीसी एससी एसटी लोगों को एक साथ लाने में कामयाब लग रहे हैं। उन्हें लगता है की इन तीनो की संख्या प्रदेश में 50% से अधिक है लेकिन भाजपा राज में हमेशा उनके हकों की अनदेखी हुई है। अगर अल्पेश इस पचास परसेंट को कांग्रेस से जोड़ देते हैं तो भाजपा के लिए जायदा कुछ बचेगा नहीं।

गुजरात राज्य कारोबार के लिए जाना जाता है। देश के अधिकतर बड़े व्यापारी किसी ना किसी तरह गुजरात से अपना जुड़ाव मानते है। ये एक सम्पन्न वर्ग है जो हमेशा भाजपा का बड़ा मतदाता रहा है लेकिन नोटबंदी और जीएसटी ने इनके कारोबार पर बहुत बुरा प्रभाव डाला है। ऐसे में उनसे भाजपा को समर्थन में एक तरफा वोटिंग की उम्मीद नहीं की जा सकती।

अब जबकि गुजरात के छात्र सरकार से आक्रोशित हैं,किसान दुखी हैं,व्यापारियों की कमर टूट गयी है ,पटेल और पाटीदारों ने साथ छोड़ दिया है ,ओबीसी ,एससी ,एसटी विरोध में आ गयी हैं,मुस्लिम भी साथ नहीं हैं तो ऐसे में भाजपा का परेशान होना जायज़ है.

सारे तथ्य इशारा कर रहे हैं कि भाजपा के पास सिर्फ ईवीएम् या हिन्दू मुस्लिम कार्ड का सहारा बचा है। ये दोनों फैक्टर काम नहीं करते तो गुजरात में कांग्रेस एक अच्छे मार्जिन से सरकार बनाने जा रही है.

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